Wednesday, 8 January 2014

गुजरात दंगों का सच: by अरुण जेटली जी

जनवरी, 2014 को पुणो में मधु पूर्णिमा किश्वर की पुस्तक मोदीनामा के मराठी संस्करण के विमोचन पर मुङो भी आमंत्रित किया गया था। मधु किश्वर कभी भाजपा समर्थक नहीं रही हैं, बल्कि अतीत में कई बार वह पार्टी की आलोचना करती रही हैं। यह किताब महीनों के शोध के बाद लिखी गई है।


2002 दंगों के संदर्भ में उन्होंने अनेक लोगों से बातचीत की और इस बातचीत व अन्य जमीनी तथ्यों को किताब का आधार बनाया। विमोचन समारोह में मैंने गुजरात दंगों के लिए नरेंद्र मोदी को दोषी ठहराने के लिए उठाए गए अनेक कदमों या षड्यंत्रों की ओर ध्यान खींचा। मैंने अपने भाषण में तीन महत्वपूर्ण तथ्यों का उल्लेख किया। 1यह पहले दिन से स्पष्ट था कि गोधरा स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस की बोगी एस-6 में आग एक समुदाय विशेष के लोगों ने लगाई थी। इस मामले की शुरुआती जांच गुजराती पुलिस ने की थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इसकी जांच विशेष जांच दल (एसआइटी) को सौंप दी थी। एसआइटी की जांच के आधार पर अदालत में मामला चला जिसमें स्थापित हुआ कि इस घटना के एक दिन पहले गोधरा में एक मीटिंग की गई थी। रेलवे स्टेशन तक पेट्रोल वाहनों में लाया गया था। बोगी एस-6 के दरवाजे बाहर से बंद कर दिए गए थे ताकि कोई यात्री बाहर न निकल सके। 


दंगाई हथियारों से लैस थे और उन्होंने ही बोगी को आग के हवाले किया था। 1मीडिया के एक तबके और कुछ गैर सरकारी संगठनों ने यह सिद्ध करने का भरसक प्रयास किया कि बोगी को किसी ने आग नहीं लगाई थी, बल्कि उसमें सवार यात्रियों ने ही अंदर से आग लगाई थी। इस मामले में साजिश, दंगे और हत्याओं के लिए अनेक लोगों को दोषी ठहराया गया। इन दोषियों की अपील लंबित है। बोगी में आग लगाने के अकाट्य साक्ष्यों की अनदेखी करते हुए संप्रग-1 में रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने रेल मंत्रलय की ओर से रिटायर्ड जज यूसी बनर्जी की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की। इस कमेटी ने अपनी कुत्सित रिपोर्ट में बताया कि आग बोगी के अंदर से लगी थी। लोगों ने इस रिपोर्ट को कोई भाव नहीं दिया और इसे कूड़ेदान के हवाले कर दिया। न्यायालय में यह सिद्ध हो गया कि इस रिपोर्ट में उल्लिखित तमाम जानकारियां फर्जी थीं। इस फर्जी अभियान का उद्देश्य यह स्थापित करना था कि हिंदू समुदाय के लोगों ने बोगी में इसलिए आग लगाई ताकि गुजरात के लोगों को दंगों के लिए उकसाया जा सके। 


1यह स्थापित करने के लिए कि गुजरात में होने वाली हिंसा को मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी सही ठहरा रहे हैं मार्च 2002 के पहले सप्ताह में एक प्रमुख राष्ट्रीय अखबार में नरेंद्र मोदी का कथित ‘साक्षात्कार’ प्रकाशित हुआ। इस कथित साक्षात्कार में मोदी को यह कहते हुए दर्शाया गया है कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है इसलिए गोधरा हिंसा की प्रतिक्रिया में दंगे होना स्वाभाविक ही है। इस संबंध में नरेंद्र मोदी का कहना है कि उन्होंने ऐसा कोई साक्षात्कार दिया ही नहीं था। असल में इस अखबार के किसी रिपोर्टर ने साक्षात्कार के लिए उनसे कोई मुलाकात ही नहीं की थी। यह और भी विचित्र है कि यह साक्षात्कार सवाल-जवाब के रूप में प्रकाशित किया गया और इससे यह धारणा बनने में मदद मिली कि नरेंद्र मोदी ने गुजरात दंगों को उचित ठहराया। गुजरात सरकार ने संबंधित अखबार को लिखा कि इस प्रकार का कोई साक्षात्कार नहीं दिया गया है और न ही अखबार की तरफ से कोई पत्रकार मुख्यमंत्री से मिला है। इस बयान को अगले 20 दिनों तक नहीं छापा गया। इसके बाद भी इसे संपादक के नाम पत्र कॉलम में इस स्पष्टीकरण के साथ प्रकाशित किया गया कि वास्तव में कोई रिपोर्टर न मोदी से मिला है और न ही उनसे साक्षात्कार लिया है। यह साक्षात्कार कुछ न्यूज चैनलों पर मुख्यमंत्री की टिप्पणियों व बयानों को आधार बना कर ‘तैयार’ किया गया है।1यह झूठ का तीसरा चरण था जिसके आधार पर नरेंद्र मोदी के खिलाफ आरोप लगाए गए। मुख्यमंत्री के आवास पर मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक, प्रमुख सचिव, गृह और दूसरे अन्य विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक हुई। यहां पुलिस समेत राज्य सरकार के आठ वरिष्ठतम अधिकारी मौजूद थे। यह कोई ऐसा अवसर नहीं था जबकि संजीव भट जैसे एसपी स्तर के अधिकारियों को वहां बुलाया जाता अथवा वह मौजूद होते। वर्ष 2006 में शिकायतकर्ता के रूप में जाकिया जाफरी ने आरोप लगाया कि बैठक में नरेंद्र मोदी ने अधिकारियों से कहा कि कि वे हिंदू समुदाय को अपने गुस्से का प्रतिकार लेने की छूट दें और किसी को रोकें नहीं। हालांकि मुख्यमंत्री ने इन्कार किया कि उन्होंने ऐसा कोई बयान दिया था। इसके बजाय सच्चाई यह थी कि हिंसा और अधिक न फैले इसे सुनिश्चित करने के लिए कठोर कदम उठाने की योजना बनाई गई। उस समय जो बयान जारी किए गए उनमें भी मुख्यमंत्री ने किसी तरह की हिंसात्मक कार्रवाई का बदला न लेने और शांति बनाए रखने की अपील की थी।


गुजरात दंगों के आठ वर्षो बाद संजीव भट ने आरोप लगाया कि वह उस बैठक में उपस्थित थे, जिसमें उकसावे की कार्रवाई वाले बयान दिए गए। एसआइटी ने उस बैठक में मौजूद सभी आठ अधिकारियों से पूछताछ की। सभी आठ अधिकारियों ने इस तरह के किसी भी बयान के दिए जाने के साथ-साथ वहां संजीव भट के मौजूद होने की बात से इन्कार किया। एसआइटी ने बाद में अपनी जांच में पाया कि किस तरह गांधीनगर में संजीव भट के मौजूद होने की कहानी गढ़ी गई जबकि दूसरे तमाम साक्ष्य यही बताते हैं कि वह उस समय अहमदाबाद में मौजूद थे। इन साक्ष्यों में बातचीत के रिकॉर्ड भी शामिल किए गए जिनसे किसी अधिकारी के अन्यत्र जाने की जानकारी मिलती है। इसके लिए ऐसे साक्ष्य भी उपलब्ध हैं जिनसे यह पता चलता है कि कुछ गैर सरकारी संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और यहां तक कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी के लोगों की मदद से राज्य सरकार को अस्थिर करने के लिए इस तरह के षड्यंत्र गढ़े गए। जांच के बाद एसआइटी इस निष्कर्ष पर पहुंची कि उस बैठक में संजीव भट मौजूद नहीं थे और न ही ऐसा कोई बयान मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से दिया गया था। बाद में सब इसी नतीजे पर पहुंचे कि जो आरोप लगाए जा रहे हैं वे मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उस समय दिए गए बयान से सर्वथा उलट हैं। इस मामले में मजिस्ट्रेट अदालत ने भी एसआइटी की बातों को सही माना। 1उपरोक्त तीन कदमों ने करीब एक दशक तक मीडिया बहस को उलटी दिशा में ले जाने का काम किया। यह निश्चित ही उन लोगों के लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए जो लगातार झूठे आरोप लगाते रहे। मुङो सदैव यह विश्वास था कि एक दिन झूठ का पर्दा गिरेगा और सच सामने आएगा। 1(लेखक राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं)


फर्जी अभियान 16फर्जी अभियान का उद्देश्य यह स्थापित करना था कि हिंदू समुदाय के लोगों ने बोगी में इसलिए आग लगाई ताकि गुजरात के लोगों को दंगों के लिए उकसाया जा सके1 16


Copied from: Dainik Jagaran Epaper : 8 January 2014

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