प्रणय उपाध्याय, नई दिल्ली 1बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार को भारतीय समर्थन की जमीन दोस्ती की भावनाओं से ज्यादा कई चेताने वाले तथ्यों ने बनाई है। चुनाव से पहले कट्टरपंथी जमात और उसके समर्थक गैरसरकारी संगठनों को बांग्लादेशी इस्लामिक बैंकों व अंतरराष्ट्रीय इस्लामिक आर्थिक तंत्र से बढ़ी रसद ने भारत के लिए खतरे की घंटी बजाई है। विपक्षी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की बेरुखी ने भी भारत के लिए विकल्पों को सीमित किया है।
1सूत्रों के मुताबिक 5 जनवरी के आम चुनाव से पहले खुफिया एजेंसियों से मिली रिपोर्टो ने लगातार बांग्लादेश के कट्टरपंथी गुटों को इस्लामिक वित्तीय संगठनों और बैंकों के वित्तपोषण में इजाफे के सुबूत पेश किए। रिपोर्ट के मुताबिक बांग्लादेश में मौजूद करीब 18 इस्लामिक बैंकों से जमात-ए-इस्लामी समर्थक गैरसरकारी संगठनों को ताबड़तोड़ सस्ते लोन दिए गए। ‘सामाजिक कल्याण’ के ‘मुखौटे’ वाले इन गैरसरकारी संगठनों द्वारा इस्लामी बैंकों से मिली आर्थिक मदद का इस्तेमाल कट्टरपंथी, अलगाववादी गतिविधियों से लेकर हथियार खरीद के सुबूत भी मिले। सूत्रों के अनुसार इस्लामिक बैंक बांग्लादेश लिमिटेड और सोशल इस्लामिक बैंक लिमिटेड जैसे वित्तीय संगठनों को अंतरराष्ट्रीय मदद में इजाफे ने बांग्लादेश के केंद्रीय बैंक को भी चौंकाया।
सेंट्रल बैंक ऑफ बांग्लादेश इस्लामिक बैंकों की कर्ज गतिविधियों पर सख्त निगरानी के भी आदेश बीते दिनों दे चुका है। बांग्लादेश लिमिटेड में करीब 30 फीसद हिस्सेदारी सऊदी अरब के अल-राजी बैंक की है। इसमें अलकायदा के वित्तपोषकों में से एक लजनत-अल-बीर-अल-इस्लाम जैसे कथित सामाजिक कल्याण संगठनों के भी शेयर हैं। कट्टरपंथी जेहादी नीतियों की हिमायती जमात और उसका समर्थन कर रही बीएनपी का मौजूदा रुख भारत के लिए चिंता का सबब है। वर्तमान नीतियों के साथ सत्ता में बीएनपी की वापसी पर बांग्लादेश के फिर भारत विरोधी आतंकी गुटों की बड़ी शरणस्थली बनने का खतरा गहराता है। 1सैन्य सूत्रों के मुताबिक बांग्लादेश में अस्थिर हालात के बीच सीमा पर चौकसी बढ़ाने के साथ ही अवैध घुसपैठ रोकने के उपाय किए जा रहे हैं। इस कड़ी में नाइट विजन सेंसर और रडार के साथ ही बाड़ को भी चुस्त किया जा रहा है।
बांग्लादेश में किसी भी सरकार के साथ रिश्ते बरकरार रखने की बात कह चुके भारतीय खेमे ने हालांकि बीएनपी की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाने के प्रयासों में भी कोई कमी नहीं की है।
Copied from Dainik Jagaran 9 January 2014
1सूत्रों के मुताबिक 5 जनवरी के आम चुनाव से पहले खुफिया एजेंसियों से मिली रिपोर्टो ने लगातार बांग्लादेश के कट्टरपंथी गुटों को इस्लामिक वित्तीय संगठनों और बैंकों के वित्तपोषण में इजाफे के सुबूत पेश किए। रिपोर्ट के मुताबिक बांग्लादेश में मौजूद करीब 18 इस्लामिक बैंकों से जमात-ए-इस्लामी समर्थक गैरसरकारी संगठनों को ताबड़तोड़ सस्ते लोन दिए गए। ‘सामाजिक कल्याण’ के ‘मुखौटे’ वाले इन गैरसरकारी संगठनों द्वारा इस्लामी बैंकों से मिली आर्थिक मदद का इस्तेमाल कट्टरपंथी, अलगाववादी गतिविधियों से लेकर हथियार खरीद के सुबूत भी मिले। सूत्रों के अनुसार इस्लामिक बैंक बांग्लादेश लिमिटेड और सोशल इस्लामिक बैंक लिमिटेड जैसे वित्तीय संगठनों को अंतरराष्ट्रीय मदद में इजाफे ने बांग्लादेश के केंद्रीय बैंक को भी चौंकाया।
सेंट्रल बैंक ऑफ बांग्लादेश इस्लामिक बैंकों की कर्ज गतिविधियों पर सख्त निगरानी के भी आदेश बीते दिनों दे चुका है। बांग्लादेश लिमिटेड में करीब 30 फीसद हिस्सेदारी सऊदी अरब के अल-राजी बैंक की है। इसमें अलकायदा के वित्तपोषकों में से एक लजनत-अल-बीर-अल-इस्लाम जैसे कथित सामाजिक कल्याण संगठनों के भी शेयर हैं। कट्टरपंथी जेहादी नीतियों की हिमायती जमात और उसका समर्थन कर रही बीएनपी का मौजूदा रुख भारत के लिए चिंता का सबब है। वर्तमान नीतियों के साथ सत्ता में बीएनपी की वापसी पर बांग्लादेश के फिर भारत विरोधी आतंकी गुटों की बड़ी शरणस्थली बनने का खतरा गहराता है। 1सैन्य सूत्रों के मुताबिक बांग्लादेश में अस्थिर हालात के बीच सीमा पर चौकसी बढ़ाने के साथ ही अवैध घुसपैठ रोकने के उपाय किए जा रहे हैं। इस कड़ी में नाइट विजन सेंसर और रडार के साथ ही बाड़ को भी चुस्त किया जा रहा है।
बांग्लादेश में किसी भी सरकार के साथ रिश्ते बरकरार रखने की बात कह चुके भारतीय खेमे ने हालांकि बीएनपी की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाने के प्रयासों में भी कोई कमी नहीं की है।
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